साप्ताहिक सत्संग के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते मुख्य आचार्य चंद्र मोहन
होशियारपुर 19 अक्टूबर (। ): योग साधना आश्रम मॉडल टाउन में साप्ताहिक सत्संग के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन जी ने कहा कि धर्म और योग एक ही चीज है। योग ही धर्म है। संसार बिना धर्म और योग के सुखी नहीं हो सकता। विश्व शांति का एक मात्र साधन योग है। जीवन सुख और दुख के दो पहलुओं में झूलता रहता है। सुख और दुख के दो आधार शरीर और मन है। योग दोनों के साथ जुड़ा हुआ है। शरीर दुखी हो तो मन भी दुखी हो जाता है। इसी तरह मन दुखी हो तो शरीर भी दुखी हो जाता है। योग के बिना शरीर ना तो लंबी आयु भोग सकता है ना ही सुखी रह सकता है। हमें इस बात को समझना होगा। शरीर के लिए योग कुछ नहीं मांगता। वह केवल थोड़ा समय मांगता है। हम इतने आलसी हो जाते हैं कि योग के लिए घंटा आधा घंटा भी नहीं निकाल पाते। यह सत्य है कि जितनी आयु भगवान ने दी है उतनी भोगनी होगी लेकिन यह भी सत्य है कि योग के बिना वही आयु सुखी नहीं हो सकती। लेकिन जहां मन का सुख और दुख आता है वह बहुत कठिन है। मन बहुत शक्तिशाली है। वह हमारी बात मानता ही नहीं। उसने अगर दुखी होना है तो हम लाख यतन करें वह सुखी नहीं होगा। वह संसार की सबसे प्रबल चीज है। मन के सुख के 4 आधार हैं। मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा।सब से प्रेम रखें मित्रता रखें। शास्त्रों में कहा गया है कि हर एक को मित्र की दृष्टि से देखो। कोई शत प्रतिशत बुरा नहीं होता उसमें कुछ गुण भी होते हैं। हम कहते हैं कि सब में ब्रह्म है तो इसका मतलब है कि जो वह है वही हम हैं। दूसरों के प्रति करुणा का भाव रखने से हमारा मन कोमल हो जाता है। किसी को सुखी देखें तो प्रसन्न हो। कहीं पाप देखें तो उसे नजर अंदाज करें। सुखी जीवन के लिए मन में संतोष होना चाहिए। संतोष से बड़ा कोई सुख नहीं है। जो भय से मुक्त हो, राग से मुक्त हो, क्रोध न करता हो, धन का गर्व न करता, लोभ में न फंसा हो वो सुखी रह सकता है।

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