देसी स्वाद पर मिलावट का कहर — होशियारपुर के बेलनों में बन रहा ‘जहरनुमा गुड़’!
गुलियानी, होशियारपुर, 26 अक्तूबर
होशियारपुर जिला अपने देसी गुड़ और शक्कर के लिए वर्षों से प्रसिद्ध रहा है, लेकिन अब यही परंपरा धीरे-धीरे मिलावट के शिकंजे में फंसती जा रही है। होशियारपुर से टांडा रोड, जालंधर रोड और फगवाड़ा रोड पर तकरीबन 100 से अधिक गुड़ बनाने वाले बेलने (गुड़ भट्टे) सक्रिय हैं। सर्दी के मौसम में जब गुड़ की मांग बढ़ती है, तब इन बेलनों पर बड़ी मात्रा में नकली और मिलावटी गुड़ तैयार कर बाजारों में पहुंचाया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, इन बेलनों में असली गन्ने के रस की जगह कई बार उसमें हल्की दर्जे की सस्ती चीनी मिलाई जा रही है, जिसकी कीमत मात्र 30 प्रति किलो है। इससे न केवल गुड़ की मिठास कृत्रिम रूप से बढ़ाई जा रही है बल्कि उसकी गुणवत्ता भी पूरी तरह से नष्ट हो रही है। यही नहीं, वजन बढ़ाने के लिए कुछ जगहों पर पिघली हुई चर्बी का भी उपयोग किया जा रहा है, जो सेहत के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
जानकारों का कहना है कि शुद्ध गुड़ का रंग हल्का भूरा या सुनहरा होना चाहिए, जबकि मिलावटी गुड़ को ज्यादा आकर्षक और गहरा रंग देने के लिए रासायनिक पदार्थों (केमिकल्स) का प्रयोग किया जा रहा है। यह केमिकल मानव स्वास्थ्य के लिए घातक हैं, जो लंबे समय में लीवर, किडनी और पेट संबंधी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं।
फिर भी, यह नकली गुड़ “देसी गुड़-शक्कर” के नाम पर 80 से 100 रुपए प्रति किलो तक के भाव पर बेचा जा रहा है। आम उपभोक्ता स्वाद और रंग के झांसे में आकर इसे शुद्ध मान बैठते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि बाजार में बिक रहे ऐसे अधिकांश गुड़ में न तो गन्ने की असल खुशबू है, न ही उसमें पोषक तत्व शेष बचे हैं।
स्थानीय किसानों और उपभोक्ताओं ने प्रशासन से मांग की है कि ऐसे मिलावटी बेलनों पर सख्त कार्रवाई की जाए। स्वास्थ्य विभाग और खाद्य सुरक्षा विभाग को भी इस दिशा में विशेष निगरानी रखनी चाहिए ताकि लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ न हो सके।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि पहले होशियारपुर का गुड़ पंजाब, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर तक अपनी मिठास और गुणवत्ता के लिए मशहूर था। लेकिन अब लालच और मिलावट ने इस पारंपरिक व्यवसाय की छवि को धूमिल कर दिया है।
अगर प्रशासन ने समय रहते इन बेलनों पर लगाम नहीं लगाई तो आने वाले समय में “होशियारपुर का देसी गुड़” सिर्फ एक नाम भर रह जाएगा। उपभोक्ताओं को भी सतर्क रहना होगा और शुद्धता की पहचान करना सीखना होगा, ताकि उनके घरों तक स्वाद के साथ जहर न पहुंचे।
देसी स्वाद की मिठास बचाने के लिए अब सख्त कार्रवाई और जन-जागरूकता दोनों जरूरी हैं।
इस संबंध में जिला स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. जितेंद्र भाटिया ने जानकारी देते हुए बताया कि इस वर्ष केवल कुछ ही गुड़ बनाने वाले बेलने वालों ने लाइसेंस लिए हैं, जबकि कई पुराने लाइसेंसधारकों की अवधि दो से तीन वर्ष की होती है। उन्होंने कहा कि गुड़ में चीनी मिलाना सब-स्टैंडर्ड क्वालिटी की श्रेणी में आता है और ऐसे उत्पादों के सैंपल जाँच में निश्चित रूप से फेल पाए जाएंगे। डॉ. भाटिया ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने बताया कि विभाग जल्द ही एक विशेष निरीक्षण अभियान चलाएगा, जिसके तहत मिलावटी गुड़ बनाने वाले बेलने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने जनता से भी अपील की कि वे सस्ता और नकली गुड़ खरीदने से बचें तथा केवल प्रमाणित स्रोतों से ही गुड़ या शक्कर खरीदें, ताकि स्वास्थ्य पर कोई विपरीत असर न पड़े।

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